वृक्ष की वह शाखा ,
हरित पर्ण से सुशोभित
रूप और यौवन में मदमस्त
स्वर्णिम आभा से अभिभूत
शीतल झोंकों से आह्लादित ।
किस उक्ति से है आज वो व्यथित ?
वह प्रश्न जिससे है आहत
आक्षेप से विचित्र सी अकुलाहट
एक भय से है कम्पित ।
यह व्यथा निरर्थक है
जिस अस्तितव के लिए तू आकुल है
भयाकुल मन को शांत कर
देख , वह तो इस वृक्ष का मूल है ।
कल तू शोभायमान न हो ,
सौंदर्य पर गर्वित भी न हो
परन्तु यह वृक्ष , इसकी जड़ें सदा हैं
प्रणय के तुम्हारे गीत निवेदित करती हैं ।
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