श्रद्धा सुमन

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

नित दिन नए प्रश्नों के साथ खड़ा जीवन भी आज मौन है ।
आरती के मधुर गान ने भी क्रंदन की चादर ओढ़ ली है ।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

अंतस के कोमल तरंग भी आज चीत्कार से विचलित हुए हैं ।

धरती का ओज भी रक्त की बूंदों से लज्जित हुआ है ।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

राखियों ने अनंत प्रतीक्षा का वचन लिया है ।
कांपते हाथों ने लाठियों को गोद लिया है ।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

नन्हे क़दमों ने एकाकी चलने का संकल्प लिया है ।
चूड़ियों ने टूटकर अनोखा साहस दिखाया है ।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

कुछ स्वप्न भी उन बंद आँखों में सो गए हैं ।
इच्छाओं ने भी गिरते देह में समाधि ले ली है ।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है ।
आज मृत्यु भी नतमस्तक है ।

पिता ने जब अपने अंगज को अग्नि को सौंपा।

वीर पुत्रों को जब देश ने कांधा दिया।

आज विलाप स्वयं विलाप कर रही है

आज मृत्यु भी नतमस्तक है

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