दान

जिस कन्या का पिता ने किया दान
वह फिर नित नूतन करती दान
प्रथम दान स्वप्नों का जो चक्षु में थे लीन
अधरों में खेलती मृदु हास्य भी करती प्रदान
प्रतिक्षण करती आत्म गौरव का हनन
निज देह व ह्रदय का समर्पण
स्व गेह में करती स्वत्व अर्पण
अश्रु से फिर करती नव निवास का सृजन
नवयौवना के उच्छृंखलता का कर परित्यजन
करती है मातृत्व गौरव का वहन
यह श्रृंखला दान -प्रतिदान का है अंतहीन
वह परम दानी किन्तु फिर भी है निरभिमान

2 responses to “दान”

  1. Smita, aap apni utkrusht kavitaon ka sankalan keejiye…..ati sunder shabdon mai vyakt ki hui hain aapki kavitayein ….bahot hi sunder

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    1. Thanks Harshu. Mujhe idea nai hai kis tarah sankalan karna chahiye

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