जिस आँगन में बचपन बिता
लगा यौवन का टीका
माँ का आँचल लहराया
रहा पिता का साया
विदा भोर में माँ ने समझाया
उस घर है अब ठौर तुम्हारा
माँ
यहाँ निशि वासर उलाहनों से सत्कार
नित नए कर्तव्यों की सूची भी तैयार
तनिक झोंको से है संकेत मुख -द्वार
नेत्र नीर है अब श्रृंगार
अधर छिपाये कितने उदगार
माँ
कहो अब कहाँ ठौर मेरा ?
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