वो कहते हैं प्यार लिखो , कुछ श्रृंगार कहो ।
अंतस के कोमल उदगार खोलो ।
पतझड़ की चर्चा छोड़ अब मधुमास रचो ।
रवि की तपिश को विधु की शीतलता से सींचो ।
वो कहते हैं प्यार लिखो , कुछ श्रृंगार कहो।
प्रथम मिलन की मधुर कम्पन कहूं
या ह्रदय में नाम की झंकार सुनाऊँ
दूरियों में सामीप्य का अनुभव लिखूं
या प्रेम के सौगंधों की सूचि बताऊँ
वो कहते हैं प्यार लिखो , कुछ श्रृंगार कहो ।
प्रियतम के प्रणय निवेदन का राग सुनाऊँ
या उनके अंकों की पगडंडियों में सिमटी अनुराग गाऊं
हरसिंगार सी सुवासित काया को चित्रित करूँ
या चांदनी से निर्मल भावों का गान करूँ
वो कहते हैं प्यार लिखो , कुछ श्रृंगार कहो ।
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