हाँ मैं ख़ामोश हूँ ,
बस्तर के घने जंगलों की तरह
सीने में अपने
सांप लिपटाए हूँ ।
पर मैं ख़ामोश हूँ ।
रोज़ उठती चीखों का
गला दबाए हूँ ।
कंधे पर अपने चालों का
बोझ उठाए हूँ ।
पर मैं ख़ामोश हूँ ।
मौत से ज़िन्दगी को
छान रही हूँ ।
धुप के टुकड़ों से
अंधेरों को सिल रही हूँ ।
पर मैं ख़ामोश हूँ ।
अपनी ही लकड़ियों से
आग जलाए हूँ ।
गुमनामियों में नाम
तलाश रही हूँ ।
पर मैं ख़ामोश हूँ ।
सन्नाटों को तूफ़ानों से
चीर रही हूँ ।
रोज़ एक नई
कहानी लिख रही हूँ ।
पर मैं ख़ामोश हूँ
बस्तर के घने जंगलों की तरह ।
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