ये कैसा मंज़र है साहब
ना चाकू , ना खंज़र लाशें बेहिसाब ।
बस दूरियां हैं , और चेहरे पे नक़ाब
दर्द है दवा नहीं , अपने हैं पर नहीं करीब ।
नदियां सिमट कर लकीर बन गयीं
शायद आँखों में समाके नेत्रनीर बन गयीं ।
खुले आसमानों से कमरों में रह गयी
ज़िन्दगी अब ऑक्सीजन सिलिंडरों में बस गयी ।
करो या मरो से करो ना हो गयी
हर बीमारी बस कोरोना हो गयी ।
इस दौर में हुज़ूर वक़्त बेमानी हो गयी
मौत से वफ़ा करके ज़िन्दगी बेवफा हो गयी ।
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