ज़िन्दगी

ज़िन्दगी यूँ ही तू बदनाम नहीं
हर सुबह नया इम्तिहान एक पैग़ाम है
रोज़ बुनती हूँ तुझे उम्मीदों के धागे से
फिर भी मिलती है तू उलझी सी तकियों में
इतनी भी ना रख तू कसौटियां
की हक़ में रह जाएं बस तन्हाईयाँ

ज़िन्दगी यूँ ही तू बदनाम नहीं

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