कवि आलसी है

जब चर्चा हुई उस घड़ी,

बात कही तुमने विषम बड़ी ।

उपनाम देकर तब साथ ,
ह्रदय किया था आहत ।

जननी के कंठ से निकली रसभीनी ,
किसी कवि की थी वाणी ।

वीणा वादिनी का प्रथम वंदन ,
कवि का था अभिनन्दन ।

प्रेयसी के रूप ने किया था हलचल ,
कवि ने दिया था वो प्रेम धरातल ।

युद्ध का हुआ जब शंखनाद ,
उठो , जागो !
कवि का था आह्लाद ।

क्षुधा की पीड़ा से हुआ जब मानव व्याकुल ,
तब कवि का ही स्वर था आकुल ।

जब क्रान्ति का चला चक्र ,
कवि ही था उस क्षण मुखर ।

रूप में , रंग में ।
धरती और अम्बर में ।
संघर्ष और कर्म में ।
आस और उल्लास में ।
जीवन और पतन में ।
ममता और प्रेम में
कवि है कवि हैt

फिर आँख मलते तुमने कटाक्ष किया
कवि आलसी है ।

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