तू सुबह की धूप बनकर मुंडेर पर आता है,
शबनमी बूँद बनकर मेरी आँखों में चमकता है
कभी धानी चुनरी बनकर लिपट जाता है
और कभी सांसों में महक बनकर घुल जाता है।


मैं जीती हूँ हर रोज़ तेरी धड़कन बनकर
और छू लेती हूँ तुझे हवा में बिखरकर
सिमटती हूँ तुझमें दूरियों में नज़दीकियां नापकर
करवटें लेती हूँ साथ तेरे सिलवटें बनकर
आ मिल जाएं चाहत और उम्मीद बनकर

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