पौराणिक कहानियों में नारद जी का उल्लेख बहुधा मिलता है ।वह एक ब्रमहर्षि थे ।वह धरती , स्वर्ग सभी स्थान में जा सकते थे ।
देवताओं , दानवों व मनुष्यों सभी से मेल – जोल व विचार – विमर्श करते थे ।
नारद जी बहुत विनोदी स्वभाव के थे । इस हेतु यहाँ की बात वहाँ भी करते थे।
नारद जी के घुमंतू स्वभाव के विषय में एक पौराणिक कहानी प्रचलित है ।
कई वर्ष पूर्व दक्षब्रम्ह नामक एक धनी व्यक्ति थे । उनके कई पुत्र थे ।
एक दिन वह अपने ज्येष्ठ पुत्रों को बुलाकर कहते हैं -“ विवाह पूर्व तुम सब आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति हेतु हिमालय में तप करो ।”
पुत्रों ने पिता की आज्ञा का पालन किया एवं हिमालय में तपस्या करने लगे । उसी समय नारद मुनि ध्यानरत बालकों को देखते हैं । वे उनसे उनका परिचय व तपस्या का उद्देश्य पूछते हैं । तपस्या का कारण जानकार वह विनोद में बालकों से कहते है – “ विवाह दुखों का कारण है । तप से तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी ।”
उन बालकों पर नारद जी के बातों का प्रभाव होता है । पिता के बुलाने से वे जाने से मना कर देते हैं ।
अब दक्षब्रम्ह अन्य पुत्रों को भी तप हेतु भेजते हैं । नारद मुनि उनसे भी वही बातें कहते हैं । वे भी मुनि बात मानकर तप करने का निर्णय लेते हैं।
किंतु इस बार दक्षब्रम्ह जान लेते हैं यह नारद जी का काम है । वे मुनि पर क्रोधित होते है कि उनके हस्तक्षेप से उनके पुत्र गृहस्थ जीवन बसा ना पाए। क्रोध में वह नारद जी को श्राप देते हैं कि वे कभी भी एक स्थान पर बस नहीं पाएँगे ।
तभी से नारद जी एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते रहते हैं ।
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