रेवती

ऋषि रितवाक के पुत्र का जन्म रेवती नक्षत्र में होता है। वह अत्यंत आलसी व दुराचारी होता है ।ऋषि अपने पुत्र के इस स्वभाव का दोषी रेवती नक्षत्र को मानते हैं । वे , रेवती को क्रोधवश श्राप देते हैं । उनके श्राप से रेवती , धरती में कुमुद पर्वत में आ गिरती हैं ।

रेवती के ज्योति का कुछ भाग नीचे घाटी में भी गिर जाता है। जहाँ एक नदी उत्पन्न हो जाती है । इस नदी के जल से एक कन्या का जन्म होता है ।

यह कन्या ,ऋषि प्रमुचा को प्राप्त होती है । वे उसका नाम रेवती रखते हैं।अपनी पुत्री समान उसका लालन-पालन करते हैं।

रेवती अत्यंत रूपवती तथा गुणी कन्या होती है ।

उसके विवाह योग्य होने पर ऋषि प्रमुचा, अग्नि देव से रेवती के विवाह की चर्चा करते हैं।अग्नि देव कहते है रेवती का विवाह राजा दुर्गम से होगा ।

कुछ दिनों बाद राजा दुर्गम , ऋषि प्रमुचा के आश्रम आते हैं। रेवती के रूप पर वह मोहित हो जाते हैं। ऋषि उन्हें विवाह का प्रस्ताव देते हैं जिसे वह सहर्ष स्वीकार करते हैं ।

रेवती विवाह के लिए शर्त रखती हैं कि वे रेवती नक्षत्र में विवाह करेंगी । ऋषि इससे चिंतित हो जाते हैं।रेवती की ज़िद मानकर अपने तपोवन से वे रेवती को पुनः नक्षत्र रूप में स्थापित कर देते हैं।

तत्पश्चात् रहा दुर्गम व रेवती का विवाह रेवती नक्षत्र में सम्पन्न होता है।

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