उषा

कई वर्ष पूर्व बाणासुर ने शिवजी से वरदान प्राप्त किया था की उसे स्वर्ग व धरती में कोई जीत ना सके ।

बाणासुर के पुत्री का नाम उषा था।वह एक विवाह योग्य, रूपवती कन्या थी।किंतु , उषा को असुर राजकुमारों में कोई रुचि नहीं थी ।उषा के सखी का नाम चित्रलेखा था ।

एक रात्रि , उषा को स्वप्न में एक राजकुमार दिखाई देता है ।वह उस,राजकुमार के प्रेम में पड़ जाती हैं।अपनी यह अवस्था वह चित्रलेखा से कहती हैं ।चित्रलेखा एक बहुत ही समझदार कन्या थी ।वह बहुत ही अच्छी चित्रकार भी थीं ।

चित्रलेखा , उषा को सुझाती हैं कि वे सभी ज्ञात राजकुमारों के चित्र बनाएँगी व उषा को उन चित्रों में से अपने स्वप्न के राजकुमार को पहचानना होगा ।

यह एक कठिन कार्य था ,किंतु चित्रलेखा इसे सम्पन्न करती हैं।

उषा जिन राजकुमार के चित्र को पहचानती हैं ,वह अनिरूद्ध थे , श्रीकृष्ण के पोते तथा प्रद्युम्न के पुत्र ।

चित्रलेखा चिंतित हो जाती हैं कि, उन तक उषा का विवाह -प्रस्ताव कैसे पहुँचाए । द्वारिका नगरी में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी ।

वे इसी चिंता में द्वारिका की ओर प्रस्थान करती हैं,मार्ग में उन्हें नारद मुनि के दर्शन होते हैं।वे नारद मुनि से अपनी व्यथा कहती हैं।मुनिवर उन्हें कार्य सम्पन्नता का उपाय व आशीर्वाद देते हैं ।

चित्रलेखा निरबाधित अनिरुद्ध के समक्ष पहुँच जाती हैं । वे अनिरुद्ध से उषा के स्वप्न विषय में कहती हैं।अनिरुद्ध, चित्रलेखा से बताते हैं कि उन्होंने भी एक सुंदर राजकुमारी को स्वप्न में देखा था ।चित्रलेखा, अनिरुद्ध को उषा के पास ले जाती हैं और उनका गंधर्व -विवाह करवाती हैं।

बाणासुर को ज्ञात होते ही वे अनिरुद्ध के साथ युद्ध के लिए आ जाते हैं व अंततः उन्हें नागपाश में बांध देते हैं।

श्रीकृष्ण व प्रद्युमन्न अपनी सेना के साथ बाणासुर के साथ युद्ध हेतु आ जाते हैं । बाणासुर की रक्षा हेतु स्वयं महादेव प्रकट हो जाते हैं ।

इस भीषण युद्ध में कृष्ण सुदर्शन -चक्र से बाणासुर के सौ भुजाओं को काट देते हैं ,किंतु महादेव के आशीष से उसे मारना संभव नहीं था ।

महादेव के आदेश से बाणासुर श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हैं ।श्रीकृष्ण उन्हें क्षमा कर देते हैं।

तत्पश्चात् उषा व अनिरुद्ध का विवाह पुनः धूमधाम से सम्पन्न होता है ।

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