नचिकेता, ऋषि वजश्रवास के पुत्र थे।उन्हें बाल्यावस्था से ही आत्मज्ञान हेतु जिज्ञासा थी ।
एक बार ऋषि वजश्रवास, देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गायों का दान करते हैं।नचिकेता को यह बात अच्छी नहीं लगती की उनके पिता बूढ़ी , अस्वस्थ गायों का दान कर रहे हैं।वे समझते हैं कि इस तरह तो पिता को स्वर्ग में स्थान प्राप्त नहीं होगा अतः वे कहते हैं- “ मैं भी आपका पुत्र हूँ , आप मुझे किसे दान में देंगे ?”
उनके बार -बार पूछने पर पिता कहते हैं- “ मैं तुम्हें स्वयं यमराज को दान दूँगा ।”
पिता के बारंबार पश्चाताप करने के बाद भी वे यमराज के निवास की ओर प्रस्थान करते हैं ।यमराज की अनुपस्थिति में नचिकेता बिना खाए – पिये उनकी प्रतीक्षा करते हैं । यमराज , नचिकेता के लगन से अत्यंत प्रभावित होते हैं तथा नचिकेता से तीन वर माँगने को कहते हैं ।
प्रथम वर में नचिकेता , स्वयं तथा पिता के लिए शांति की माँग करते हैं।
द्वितीय वर में वे यम से अग्नि में समर्पित की जाने वाली आहुतियों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
तृतीय वर में मृत्यु पश्चात क्या होता है ?इस भेद को जानना चाहते हैं।यम इस हेतु स्वीकृति नहीं देते तथा नचिकेता को दीर्घायु ,संपत्ति ,राज्य इत्यादि लेने को कहते हैं। नचिकेता इन सबको क्षणिक व नश्वर मानकर माना कर देते हैं।
अंततः यम , नचिकेता को आत्मा , परमात्मा व ब्रह्म ज्ञान देते हैं।
नचिकेता को कम आयु में ही सांसारिक सुखों की क्षणिकता का भान तथा आत्मज्ञान प्राप्त हो गया था ।
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