दुविधा

बन कस्तूरी मृग भटक रहा है मन ,
प्रेम गंध की चाह में विकल हो रहा क्षण – क्षण ।

बुनकर स्वयं मोह का तंतु ,
मनुज उलझ रहा बनकर लूत ।

यह भान नहीं किस मार्ग चला है ?
अज्ञानी को ज्ञात नहीं किस हेतु फिर रहा है ?

यदि तृष्णा केवल प्रीति की है ,
निश्चय ही प्रियतम के अंक में निर्वाण है ।

किन्तु क्यों तथापि अतृप्ति का बोध है ?
उस बाहु – वलय में भी ह्रदय आकुल है ।

अधरों के मिलन की आतुरता दौड़ रही थी शिरा में ,
प्रिय के मिलन से भी उष्णता नहीं रक्त में ।

यह द्वंद्व , यह दुविधा मानव की नियति है ।
असंतुष्टि तथा लालसा उसकी प्रकृति है ।

जिस रूप को आलिंगन में करने हेतु व्याकुल था ,
उस प्रियतम के वक्ष में शीश धर भी अतृप्त रहा ।

प्रेम जो सम्पूर्ण , सत्य व शाश्वत है ,
वह नित्य अन्तःकरण में स्थापित है ।

2 responses to “दुविधा”

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