बुद्ध पूर्णिमा

बुद्ध पूर्णिमा, वैशाख माह में पड़ता है। गौतम बुद्ध की तीन बड़ी घटनाएँ इस दिन हुई थीं,इसलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं।

प्रथम – उनका जन्म , द्वितीय- ६ वर्षों की कठोर साधना पश्चात आत्मज्ञान की प्राप्ति ,तृतीय घटना – ४५ वर्षों तक लोगों को ज्ञान देने के पश्चात ८० वर्ष की आयु में निर्वाण कि प्राप्ति ।

गौतम बुद्ध का बाल्यकाल में सिद्धार्थ नाम था ।वे राजा शुद्धोधन तथा माया के पुत्र थे । ज्योतिषी के अनुसार सिद्धार्थ युवावस्था में या तो प्रतापी राजा या संन्यासी बनेंगे ।इस भय से उनके पिता ने यह सुनिश्चित किया कि सिद्धार्थ २९ वर्ष की आयु के पश्चात ही महल से बाहर जाएँ।

महल के बाहर उनके प्रथम भ्रमण में वे तीन व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं- एक वृद्ध, एक अस्वस्थ तथा एक मृतक ।ये दृश्य उनके मन में करुणा तथा जिज्ञासा उत्पन्न कर देते हैं। आत्मज्ञान की प्राप्ति हेतु वे महल छोड़ देते हैं।

ऐसा माना जाता है कि सुजाता नामक एक ग्वालन ने संतान प्राप्ति हेतु बुद्ध पूर्णिमा के दिन , भगवान बुद्ध को खीर भोग लगाया था । उस दिन से खीर लगाने की प्रथा है ।

इस दिन भगवान बुद्ध के अनुयायी मंदिर जाते हैं , पूजा व ध्यान करते हैं ।

सारनाथ में भव्य मेले का आयोजन होता है ।मुक्ति के प्रतीकात्मक रूप में भक्त पशु – पक्षियों को पिंजरे से मुक्त करते हैं ।

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