प्रेम की विडम्बना

बड़े यत्न से माली उपवन में पुष्प खिलता है ,
उस पुष्प को एक दिन तब वह तोड़ देता है ।

यूँ ही पुरुष भी नारी के मन में प्रेम -कुसुम जगाता है ,
अवनि औ अम्बर मध्य सब संभव करने का दम्भ देता है,
असीम -आनंद का स्त्रोत केवल रूपसी को कहता है ,
कितने ही जन्मों के संबंधों को क्रमवार करता है ,
संग ह्रदय के कितने ही भूखंडों को वार देता है ।

आह ! लीला इस अपार प्रेम की ।

प्रेम -प्रसून जब नारी के मन में जगता है ,
तीनों लोक तब प्रियतम में बसता है ,
प्रीति का अर्थ सम्पूर्ण -समर्पण होता है ,
प्रिय उसके जीवन का आधार बन जाता है ,
प्राण -प्रिय के अंकों में सौंदर्य निछावर होता है ।

आह ! विडंबना इस अपार प्रेम की ।

नारी का प्रेम प्राप्त कर पुरुष विमुख हो जाता है ,
तजकर उस रूपसी को एकाकी , स्वयं बढ़ जाता है ,
नीड़ प्रणय का तब छिन्न-भिन्न हो जाता है ,
तब वेदना , क्षोभ , एकाकीपन शेष रह जाता है ।

आह !पीड़ा इस अपार प्रेम की ।

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