बार -बार डूबती -उतरती हूँ
तुम्हारे ख़यालों में
कभी
मुस्कुराकर गले लग जाती हूँ
कभी
रूठकर रोने लगती हूँ
चुप रहकर भी
सब बोल देती हूँ तुम्हें
जानते हो
रोज़ समेटती हूँ
तुम्हारी यादों को
और फ़िर रख देती हूँ
उस लाल साड़ी के नीचे
तुम तो आते नहीं हो
वे ही मेरा मन
बहलाती है
फ़िर मत कहना
उनसे दिल लगा लिया
तुम तो आते नहीं हो

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