बेहतर हूँ , कमतर हूँ ,
मैं , मैं हूँ ।
तुम कहते हो मैं तुम जैसी नहीं हूँ ।
हाँ , नहीं समझती मैं
झूठ -सच की बातें ,
धोखेबाज़ियाँ ,
जालसाजियां ।
नहीं आता मुझे
रिझाना
मनाना
लम्बी बातें करना
दूर रहती हूँ मैं ,
मुखौटों से ,
बनावटी भीड़ ,
रंगीन रातों से ।
सजाती हूँ मैं अपनी दुनिया ,
आँखों में प्यार चमकता है ,
ज़ुबान में सच टिकता है ,
दिल में विश्वास पनपता है ।
बेहतर हूँ , कमतर हूँ ,
मैं , मैं हूँ ।
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