याद आता है वो
घर का आँगन
और आँगन में तुलसी का पौधा
गूँज जाती है कानों में
पापा का बुलाना ‘मिनी ‘
धुंधलके में देहरी में माँ का दीपक जलाना
एक साथ आते हैं
आँखों में आंसू और होठों में मुस्कान
बाबा के संग अंताक्षरी खेलना
और कभी दादी से लड़ना
याद आती है दीदी बनकर
भाइयों के झगड़े सुलझाना
साथियों के साथ खेलना
कभी विष-अमृत और
कभी छुप -छुपाई
माँ बनकर भी याद आती है
माँ की बेटी
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