विरह 

प्रश्नों के नित चक्रवात उठते है
मुझको विचलित कर जाते हैं
रह – रहकर अश्रु उमड़ते हैं
नयनों में सीमित हो जाते हैं

मिलन की वेला आएगी
प्रिय तब तुमसे पूछूँगी


यह ज्वार तुम्हारे ह्रदय नहीं उठता ?
एकाकीपन का शूल नहीं चुभता ?
मेरी स्मृति में नयन – नम नहीं होते ?
या यह प्रसंग सम्पूर्ण छद्म है ?
प्रेम हम दोनों का मेरा भ्रम है ?
केवल मेरा ह्रदय तुममे रम है ?

मिलन की वेला आएगी

    प्रिय तब तुमसे पूछूँगी 

तुम निरुत्तर न रहना 

प्रत्येक शंका अपनी कहना 

यदि प्रेम हो स्पष्ट कहना 

तब क्षण क्षण  मुझसे विमुख न होना 

अस्वीकृति भी अपनी कहना 

भ्रम मेरा सब तोड़ देना 

मिलन की वेला आएगी 

प्रिय तब तुम अपनी व्यथा कहना

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