हेमा

आ तेरे भरोसे पे अपनी उम्मीद रखती हूँ

रंगों से तेरे तस्वीर उकेरती हूँ

बचपन की अधूरी कहानियों से

आज नयी किताब लिखती हूँ

कुछ धुंधली भूली यादें

जवाँ होके ठहर गईं

कुछ कच्ची- सच्ची बातें

भी वहाँ रह गईं

चुन के उन यादों को बातों को

ला मैं पिरो देती हूँ

तेरी आज के धरा पर

मैं अपने कल का आसमान रख देती हूँ

तूने ख़ाब जो बुने है मिलने के

मैं हक़ीक़त की तुरपाई कर देती हूँ

जो हाथ तूने थामा है

मैं उनपर तक़दीर लिख देती हूँ

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