अनकही

कितने ही बार दिन में ख्याल आता है
तू मेरे क़रीब होता
मेरे हाथ में अपने हाथ रखता
और मैं खोल देती अपने दिल के किताब के पन्ने
फिर अपनी अनकही हर बात तुझसे कह देती
उस वक़्त को मैं थाम लेती
तेरी गोद में सर अपना रखके
तेरी कही हर बात को सहेज लेती
तेरी मज़बूरियों को ,परेशानियों को ताक में रख देती
फिर उन ख्वाहिशों को तेरे साथ बेख़ौफ़ जी लेती

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