
कैसा समय आया रे,
सूरज भी चंदा बन सकुचाया रे|
यह नए युग का प्रलय,
दिन का रात में हो रहा विलय|
पर तू तनिक चिंता ना कर मानव,
दे इस विपदा का भी तू उस पर दाव |
प्रकृति ने कर जतन तुझको पाला,
पर तू संतान है निराला|
नित प्रति करता रहा माता का दोहन,
छिन्न-भिन्न कर दिया उसका कण-कण|
आह ममता करती रही सदा पोषण,
तू निर्मोही मर्यादा का करता रहा लंघन|
हे अज्ञानी ! अब दर्प त्याग चेत जा,
अपने विनाश को स्वयं निमंत्रण दे रहा|
कर स्वीकार भूल अपनी,
शीश नवा चरणों में जननी|
तभी सूर्य का सम्पूर्ण तेज जागृत होगा,
एवं मानव का भाग्य उदित होगा|
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