कौन कहेगा व्यथा रूक्मणी की ?
मांग में सिन्दूर प्रिय की,
हाथ में कंगन प्रीत की,
कहलाती वो पटरानी कृष्ण की।
हे प्राणप्रिय, द्वारिकाधीश!
मैं स्वयं को तुमपे वारी,
यह ह्रदय तुमपे हारी,
मान-अभिमान सब निछारी,
किन्तु हो सकी न प्राणप्रिय।
हे मोहन, मेरे स्वामी !
क्या रह गई कभी प्रेम में,
या मेरे समर्पण में ?
नित दिन मैं रत तुममे,
तुम बसते हो मुझमे।
हे कान्हा, प्राणेश!
मैं अर्द्धांगिनी, जीवनसंगिनी,
तुम्हारे प्रासाद की स्वामिनी,
सहचरी, सह धर्मिणी,
गंगा सम पावनी ।
हे हृदयेश, पीताम्बर !
चाह नहीं मुझे रत्न-माणिक्य,
ना अम्बर ना अलंकार,
तुम्हारे ह्रदय पर हो मेरा वास,
रहूं सदा तुम्हे मैं प्रिय।
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