यह हास्य भी अद्भुत होती है,
कभी कभी गूढ़ लगती है।
जाने कितने भेद छिपाए हैं ,
कितनी ही बातें दबाए हैं ।
भेदों को खोलने की आकुलता,
चपलता और चंचलता भी है ।
सखी! इसके फेर में ना पड़ना,
यह जानती है छलना।
छल लेगी तुमको,
सुख- प्रेम ले लेगी उनको ।
तुम स्वप्न लिए धरी रह जाओगी,
छलिया तुमको आँखों से छल लेगी ।
सखी ! यह हास्य अद्भुत होती है ।
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