जब मैं शृंगार करती हूँ ,
माथे में बिंदिया, हाथों में चूड़ी पहनती हूँ ।
पैरों में पायल खनकाती हूँ ।
प्रिय तब तुम याद आते हो ।
जब बूँदें गाती हैं सावन में ,
पपीहा तान देता है डालों में ।
चाँद छिप जाता है बादलों में ।
प्रिय तब तुम याद आते हो ।
जब सखियाँ छेड़ती हैं ,
नाम तुम्हारा पूछती हैं ,
आँखों में तुम्हें ढूँढ लेती हैं ,
प्रिय तब तुम याद आते हो ।
जब हाथों में था हाथ ,
मिलन की आयी थी रात ,
तुम चले गये दे यादों की सौग़ात ।
प्रिय अब तुम याद आते हो ।
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