शिव

रे मन धीर धर,
है कठिन डगर,
पर हाथ थामने ,
वो खड़ा सामने ।
तू कर समर्पण,
भय को अर्पण ।

वह शिव है, नीलकंठ है,
वही तो आदि- अनंत है।
जब अमृत बंट रहा था,
उसने पिया हलाहल था।

वह शक्ति है, शांत है।
वही तो सरल है।
जब सती ने आत्मदाह किया ,
उसने अनंत प्रतीक्षा जिया।

वह प्रचंड है, धीर है।
वही तो केवल स्थिर है।
जब तीनों लोक था विचल,
उसने ध्यान सिखाया केवल।

वही योगी है, पतिश्रेष्ठ है।
वही तो संपूर्ण है ।
जब छल था व्याप्त ,
उसने निश्छल प्रेम बताया ।

रे मन धीर धर,
है कठिन डगर,
पर हाथ थामने ,
वो खड़ा सामने ।
तू कर समर्पण,
भय को अर्पण ।

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