सर्दी की सुबह भी विलक्षण होती है,
कई चरणों में नींद खुलती है।
प्रथम चरण में केवल एक आँख खुल पाती है,
पास पड़े मोबाइल में समय देखती है ,
अभी समय है सोच पुनः बंद हो जाती है।
अब द्वितीय चरण की बारी आती है,
इसकी भी स्वयं की परंपरा होती है।
इस चरण में उठने की बेला बीत जाती है,
किन्तु रजाई में देह पड़ी रहती है।
यह चरण बहुधा करवटों में बीतती है,
जब बायां थक जाए तो दाएं की बारी होती है।
चलो द्वितीय चरण के बाद, तृतीय चरण आती है,
यह चरण तो संघर्षों से भरी होती है।
जूझकर रजाई से देह उठने की तयारी करती है,
फिर मन की सुनकर बैठे हुए ही रजाई खिचती है।
तन व मन के द्वंद्व में मन पराजित होती है,
कई निर्देशों के साथ फिर उठने की अनुमति देती है।
रजाई को छोड़ देह अब स्वेटर को खिंच लेती है,
दांतों को क्षण-भर ठंडा पानी है सहना, ये मन समझती है ,
गर्म चाय से फिर स्वयं को सेंक लेना , कहती है।
सब चेष्टा छोड़ो, अब कोहरे भरी सुबह बुलाती है,
मद्धम हुए सूरज की भी आवाज़ उठती है।
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