मैं फिर मज़बूत बन जाती हूँ,
इरादे पक्के कर लेती हूँ।
पर दर्द होता है, और
उस दर्द को कोने में दबा देती हूँ,
फिर अपने मुस्कुराहट से छिपा लेती हूँ ,
और आगे बढ़ जाती हूँ ,
फिर मैं सँवरने लगती हूँ ,
पर मेरा कुछ टूट जाता है,
उन टुकड़ों को मैं सी लेती हूँ ,
और अपने सम्मान से ढँक देती हूँ ,
मैं सबसे दूर हो जाती हूँ ,
और अकेले चलने लगती हूँ।
और इन सबमे मेरा वो ,
मासूम ‘मैं’ छूट जाता है ,
मेरे ज़ख्मों और मासूमियत में ,
वो खो जाता है।

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