तुझसे जुडी हर उम्मीद को दफ़्न करती हूँ
कि तेरे आने के ख्यालों को नेस्तनाबूद करती हूँ
एक चाह थी तुझसे हाल-ए-दिल बयान करने को लो मैं मिटाती हूँ
जो तड़प थी तेरे बाहों में बिखरने की उसे ख़त्म करती हूँ
उन यादों को जो मेरे दरवाज़े पे दस्तक देती थीं उन्हें बेदख़ल करती हूँ
ख़ुद पे तेरे हक़ से तुझे अब महरूम करती हूँ

कि तू ना रखना अब वास्ता मेरे ख़ाबों से,
ज़िंदगी में चल रहे मेरे हिसाबों से ।

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