हर्फ़ दर हर्फ़ रूहानी

तुझसे दूर जाने की हर कोशिश तेरे और क़रीब ले आती है,
कि भुलाने कि तदबीर यादों का मेला ले आती है।
कभी नामुमकिन लगता है ये सफर तेरे बिना,
पर खुद को समझा देती हूँ कि तक़दीर में नहीं मिलना।
और उन मायूस रातों को थपकी देकर सुला देती हूँ ,
अब दिन को भी मैं किसी उम्मीद से नहीं बांधती।
ये ऑंखें इंकार करती हैं अब देखना कोई सपना ,
कि दिल भी भूल जाता है कुछ धड़कने-धड़कना।
पर कहीं तो मैंने है ये ठाना,
कि उदासियों को है अब दफ़्न करना।
अब एक नई कहानी लिखनी है ,
हर्फ़ दर हर्फ़ रूहानी लिखनी है ।

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