धरती की गुहार

धरती
के स्वर्णिम
आभा का वर्णन
नहीं, उसके धानी ओढ़नी
का विस्तार नहीं, यह गाथा
है उसके अंतर्मन के तपिश की
दरकते- फटते उसके खेतों की, उसके आँखों
में पानी के प्यास की| वह
पुकारती है, अपने निष्ठुर संतान
को, मानव जो रत
है, स्वार्थ में,
अट्टालिकाओं के
निर्माण

में,
विस्मृत, भ्रमित।
धरती बिलख रही
दूषित हवा, दूषित पानी
उसका ह्रदय, उसका देह टूट
रहा, कण-कण बिखर रहा। हे
मानव! यह समय है जागृत होने का,
संकल्प कृत होने का, पुनः धरती
के श्रृंगार का, शुद्ध वायु,
शुद्ध जल के गुणगान
का, हरे-भरे
खलिहानों का
गान।

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