गंगा

कविताओं में रस-छंद नहीं,
पंक्तियों में प्रेम-प्रसंग नहीं।
झरनों का कल-कल नहीं,
नदियों की छल-छल नहीं।

सब लुप्त-लुप्त है,
क्या अभिशप्त है ?

हे शिव! तूने कहा था,
युगों-युगों से यह है गाथा।
गंगा है निर्मल,
गंगोत्री से गंगा सागर।

वह पतित-पावनी,
वह जीवन-दायिनी।
धरा पर सिमट रही है,
आज बिलख रही है।

यह कैसी विडम्बना है ?
अत्यंत कष्टकर है।

वह उद्धार करती है,
पापों से मुक्त करती है।
आज स्वयं मलिन है,
मानव-कर्म के अधीन है।

क्या यह हितकर है ?
सर्वथा अनपेक्षित है।

देवों के वंदन से गर्वित,
पुष्पों से सुशोभित।
गंगा अब कृशकाय हुई,
मानव-स्वार्थ से दूषित हुई।

हे मानव !अब यह अनुष्ठान करो,
निज जीवन को साकार करो।

मर्यादा का हुआ उल्लंघन,
अब उत्तरदायित्त्व का करो वहन।
गंगा निर्मल हो,
यह हमारा संकल्प हो।

गंगा की पवित्रता रहे,
कर्म में हमारे यह गरिमा रहे।

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