सूर्य नंदिनी, यम भगिनी, यमुना हूँ।
अनेक सभ्यताओं की जननि हूँ।
साक्षी हूँ मैं राधा-कृष्ण प्रेम की,
कदम्ब के डाल, बांसुरी के तान की।
हिमालय से प्रयागराज तक विस्तृत हूँ।
मैं शाम रंग, कृष्ण-प्रेम में रत हूँ।
पग अपने, मेरे शीश धर, नन्दलाल ने धन्य किया,
कालिया दमन कर मुझे विष-मुक्त किया।
हे कान्हा ! मैं परम प्रिय तुम्हारी,
इस मनुज स्वार्थ से हूँ हारी।
निज कर्म से मुझ पावनी को दूषित किया,
मेरी निर्मलता, मेरे शौर्य को धूमिल किया।
मैं प्रतिक्षा में तुम्हारी प्रतिपल क्षीण हो रही,
मुक्तिदायिनी मैं, स्वयं मुक्ति हेतु आकुल हो रही।
अब आओ गिरिधर, हे कान्हा ! हे मुरारी !
सुनो व्यथा, पुकार मेरी।
मानव अज्ञानता से प्रताड़ित कालिंदी तुम्हारी।
अब आओ नाथ, पीड़ा हर लो मेरी।
मुझे पुनः विषमुक्त, निर्मल कर दो,
एवं मानव को नव-चेतना प्रदान करो।
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