ऋतु के घर आज आवाजाही है,
सब तैयारी फाल्गुन के विदाई की है।
प्रकृति खड़ी है, टेसू के थाल लिए,
तरु भी झूम रहे हैं, नैन बिछाए।
धरती ने होली को न्योता है,
अमराई ने स्वागत में बौर सजाया है।
महुआ भी संग मादकता ले आया।
प्रियतम के ह्रदय में, कामदेव ने प्रेम-राग जगाया।
प्रियतमा ने भी है लाज की चुनरी सरकाई,
रंगों की पिचकारी से चोली-अंगिया भिगाई।
नगाड़े की थाप एवं फाग गीत,
कण-कण में हो रहा गुंजित।
अब तो प्रिय संग मिलन की वेला आयी,
सुन री सखी ! होली आई, होली आई।
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