नहीं बंधती अब उन रिश्तों में,
वक़्त के साथ जो बेड़ियाँ बन जाती हैं।
नहीं उलझती उन सवालों में,
जो मेरा सुकून छीन लेती हैं।
अब तलाशती हूँ मैं,
उन भूख से बुझती आँखों में,
रोटी की चमक।
धूप से तपते जर्जर शरीर में,
छाँव की राहत,
और कोने में अपने आधे नंगे शरीर को,
ढंकती लड़की में हिम्मत।
सड़क पर पड़ी माँ के छाती से,
लगे बच्चे में जीने की ललक।
अब ढूंढती हूँ मैं,
अपने लिए एक
उम्मीद की ज़मीन।
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