अहो! वे वीर सेनानी !
क्या माँ के स्नेह भरे निवाले को,
मन न ललचाता होगा ?
पिता के आशीष को,
वह न चाहता होगा ?
बहन के प्रतिक्षारत राखी
की स्मृति न आती होगी?
भाई के असीम प्रेम
को आत्मा अकुलाती न होगी?
संगिनी के रूप पर
क्या वह रीझता न होगा ?
या बेटी के भोलेपन पर
वह रोता न होगा?
अहो! वे वीर सेनानी !
होकर दृढ़, सर्वस्व तजकर,
चले बढ़, कर्तव्य पथ पर |
जन्मभूमि पर,स्वयं को समर्पित कर।
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