हरे-भरे ये सुन्दर-लहराते,
कभी फूलों, कभी फलों से सजे वृक्ष।
सर को उठाकर खड़े-झूमते,
कभी हवा को देख मचलते वृक्ष।
तीक्ष्ण धूप में छाया देते,
परोपकार करते ये वृक्ष।
आम, जामुन कितने और फल देते,
कभी न अभिमान करते वृक्ष।
नभ को जो थे चूमते,
क्यों झुके-उदास आज दिखते वृक्ष ?
हरित पर्णों से थे वे शोभते,
आज ठूंठ से खड़े वृक्ष।
उन्मुक्त-उल्लास से थे फूटते,
विषाद से घिरे अब वृक्ष।
स्वाभिमानी ये सब सहते,
किससे कहें, व्यथा ये मूक वृक्ष ?
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