मैं जन-जातियों की भूमि हूँ,
जलप्रपातों व गुफाओं की धरा हूँ।
लम्बे विशाल, लहराते साल,
शोभते हैं मेरे मस्तक।
मैं छत्तीसगढ़ का अंग हूँ,
मैं बस्तर हूँ, मैं बस्तर हूँ।
घने-घनघोर वनों से मेरी सभ्यता जन्मी,
इंद्रावती के तीरे संस्कृति पनपी।
सौंदर्य, संसाधन तथा शिल्प,
दक्षिण कौशल का गौरवशाली इतिहास।
बस्तर महल, चित्रकोट प्रपात, कैलाश गुफा,
दंतेश्वरी माँ की है अनुपम कृपा।
किन्तु वर्तमान मेरी सांसे अवरूद्ध हो रही,
अर्धनग्नावस्था में मेरी बालाएं चीत्कार रहीं।
मेरी छाती युवाओं के रक्त से तर है।
गोद में अनगिनत शव बिछे हैं।
न्याय-अन्याय के इस वीभत्स क्रीड़ा में,
मेरी संतान की आहुतियां हैं।
गरिमा व मर्यादा का नित-प्रतिदिन उल्लंघन,
यह किस प्रकार न्याय का है आहवाहन ?
मैं प्रसन्न हूँ लाख, शहद, तेन्दु के पत्तों में,
वनवासियों के नृत्य, गीतों में।
हे कुशाग्र बुद्धि ! तुम्हे समर्पित यह संग्राम,
मुझ अबोध को प्रिय यह नीरव-वन।
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