वन्दति गुरू चरण धूल, सुगन्धित प्रसून समान।
हर ले कष्ट पीड़ा सब, गुरु नाम कर सुमिरन।।
ओजस्वी प्रदीप्त करे, चहुँ ओ ज्ञान तेज।
निर्मल ह्रदय शिष्य करे, निज परम प्रेम ओज।।
नाम हि निखरि मन माणिक, उघरत ज्ञान लोचन।
श्री गुरू हरि मिटहिं दोष, करि अज्ञानहु सुजान।।
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