नारी

नारी! अब उठो-जागो,
जीवन की पतवार सम्भालो।

कब तक रहोगी बेचारी?
अबला और दुखी-हारी।

तुम जीवन-दायिनी हो,
प्राणों को पोषती हो।

अपने दूध से अंकुर सिंचती हो,
ममता से संकल्प रोपती हो।

मातृ-प्रेम के हेतु,
स्वयं देव भी आतुर।

अब यह निराशा त्यागो,
साहस का शस्त्र धरो।

कर दो दुर्बलता का नाश,
पराधीनता का परित्याग।

करे जो तुम पर आघात,
ना नर में हो दुस्साहस।

नारी! अब उठो-जागो,
जीवन की पतवार सम्भालो।

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