कब तक डर के साये में ज़िन्दगी जियेगी ?
बंद कमरों में सिसकियाँ घुटेंगी ?
कभी तो उन सूखी आँखों में आएगा सैलाब,
जो हर दर्द का मांगेगा हिसाब।
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कब तक डर के साये में ज़िन्दगी जियेगी ?
बंद कमरों में सिसकियाँ घुटेंगी ?
कभी तो उन सूखी आँखों में आएगा सैलाब,
जो हर दर्द का मांगेगा हिसाब।
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