हर पुरुष में दुःशासन है

कितने दुःशासनों से द्रौपदी से लड़ेगी?
क्योंकि हर पुरुष में दुःशासन दिखता है।

कौरवों की इस महासभा में,
चीर-हरण ही नहीं, अंगों के टुकड़े भी होते हैं।
काम की अग्नि में आहुतियां होती हैं,
और स्त्री के लज्जा की चिता जलती है।

क्योंकि हर पुरुष में दुःशासन दिखता है।

कौरवों की इस महासभा में,
अब केशव नहीं आते हैं।
स्त्री होने का दंड मिलता है,
चीत्कारों से गगन गूंजता है।

क्योंकि हर पुरुष में दुःशासन दिखता है।

कौरवों की इस महासभा में,
केवल मूक व दृष्टिहीन हैं।
अत्याचार व विवशता है,
एक द्रौपदी व सहस्त्र दुःशासन हैं।

क्योंकि हर पुरुष में दुःशासन दिखता है।

कितने दुःशासनों से द्रौपदी से लड़ेगी?
क्योंकि हर पुरुष में दुःशासन दिखता है।

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