हवा में सुगबुगाहट है,
दबे क़दमों की आहट है,
गले में घुटते सवाल हैं,
और हर शख्स की मुझपे निगाह है।
कि कब कोई खिड़की खुल जाए,
और हर ज़र्रे की मालूमात हो जाए,
मेरी डायरी का पन्ना उड़ जाए,
और मेरे किस्से आम हो जाएं।
कोई ख़ास नहीं, बहोत आम हैं,
वही सुबह, वही शाम हैं,
मेरे सब्र की स्याही से लिखे अल्फ़ाज़ हैं,
ज़ियाफ़त के इंतेज़ाम नहीं हैं। ज़ियाफ़त (Entertainment)
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