औरों सी

तुम कब हो गयी औरों सी ?
चकाचौंध में विलीन सी,
भीड़ में लुप्त सी,
पद-चिन्हों पर चलती सी।

तुम तो,
मधुमास की रागिनी सी,
श्रावण की बूंदों सी,
शरद के शशि सी।

तुम तो,
पंक में पंकज सी,
मरुथल में शाद्वल सी,
जलावर्त में पतवार सी।

तुम कब हो गयी औरों सी ?

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें