ओ सजनी, ओ सजनी !
रूप तेरा श्यामल, सुकोमल,
सुन्दर, चंचल, निश्छल।

ना आँखों में काजल का पहरा,
ना अधर लाली गहरा।
केशों में रात स्याह उलझ रही,
और लट नटखट भी खेल रही।

ओ सजनी, ओ सजनी !
रूप तेरा श्यामल, सुकोमल |

जो कटी कमान सी तूने तानी,
किंकिनि भी अंग लगकर हुई अभिमानी।
बड़ी भागी रे, पांव को चूमती झांझन,
और नापती कलाई को कंगन।

ओ सजनी, ओ सजनी !
रूप तेरा श्यामल, सुकोमल |

पीत वसन पर शुभ्र सुमन,
मोह रही प्रिया मेरा मन।
पुरवाई जो छूकर जाती तेरा तन,
ह्रदय में लगे चोट गहन।

ओ सजनी, ओ सजनी !
रूप तेरा श्यामल, सुकोमल |

मन करता मेरा प्रणय निवेदन,
और हो रहा आकुल प्राण।
ओ सजनी ! रूप तेरा श्यामल, सुकोमल,
और प्रेम मेरा शाश्वत, सरल।

ओ सजनी, ओ सजनी !
रूप तेरा श्यामल, सुकोमल |


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