कुछ रिश्तों में नाम का सिन्दूर नहीं होता,
कलाइयों में रस्मों की चूड़ियां नहीं होती,
वे अनब्याही दुल्हन जैसी होती हैं,
प्रेम का ओढ़नी धारती हैं
और त्याग का पायल पहनती हैं,
वे प्रियतम की दृष्टि माथे पे धारती हैं ,
और बाँहों का हार पहनती हैं ,
वे पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं,
साथ होकर भी अकेली रह जाती हैं
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