ऐ कविता तुम केवल
कुंठा और व्यथा की कथा नहीं
आक्रोश, क्रोध की लहर नहीं
श्रृंगार और विरह की गाथा नहीं
तुम
कवि की अमृत वाणी हो
उसकी ओजस्वी कहानी हो
विजय की शंख ध्वनि हो
तुम
प्रेयसी के अलकों से खेलती हो
मातृ -वंदन के गीत गाती हो
हरी बेलों से लिपटती हो
तुम
पूर्णिमा और अमावस्या हो
सुबह और साँझ की छाया हो
वैराग्य और मोह की काया हो
तुम
समावेश हो रिक्त में
पूर्ण हो शून्य में
असीम हो सीमित में
तुम
प्रखरता , ओजस्विता का प्रतीक हो
प्रेम और तल्लीनता का गीत हो
मन और इन्द्रियों पर जीत हो
तुम
सुदूर अंतरिक्ष में व्याप्त
धरा और नभ में प्राप्त
जड़ और चेतना में समाहित
ऐ कविता तुम
उन्मुक्त हो सर्वत्र हो ।
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