अब हमें संस्कार न सिखाओ

अब हमें संस्कार न सिखाओ

अब हमें संस्कार न सिखाओ,
युद्ध की कला सिखाओ ।

जिस रूप में हो दुश्मन ,
घर में हो या मैदान में ।

अब हमें झुकना न सिखाओ

अब हमें झुकना न सिखाओ,
युद्ध की कला सिखाओ ।

पिता , पति , भाई , अज्ञात या पुत्र ,
जिस वेश में हो अमित्र ।

अब हमें डरना न सिखाओ

अब हमें डरना न सिखाओ,
युद्ध की कला दिखाओ ।

घूरती आँखों , नोचते हाथों से ,
बांधते नियमों से ।

अब हमें बंधना न सिखाओ,

अब हमें बंधना न सिखाओ,
युद्ध की कला सिखाओ।

घूंघट में कभी बुर्के में ,
और कभी घर की चारदीवारी में ।

अब हमें छिपना न सिखाओ

अब हमें छिपना न सिखाओ,
युद्ध की कला सिखाओ।

अब हमें संस्कार न सिखाओ ।

2 responses to “अब हमें संस्कार न सिखाओ”

  1. You are awesome. You have a very good sensibility and observation and it reflects in your verse. Super capacity to capture and pen down the felt pronouncements.

    Liked by 1 व्यक्ति

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें